अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम समाज के महत्वपूर्ण व्यक्ति हो

Monday, August 8, 2022

*9 अगस्त : विश्व आदिवासी दिवस*

*9 अगस्त : विश्व आदिवासी दिवस*

*याद करो कुर्वानी, तेज़ करो संघर्षों की कहानी!*
*उठो , आदिवासी- भारत के वास्ते -- न्याय, समता, लोकतंत्र और इंसानियत के रास्ते*

*आज भी विरोध-विद्रोह जारी है : विस्थापन, बिखराव विपन्नता और विनाश के विरुद्ध सम्मान, स्वशासन और समता के लिए*

*संसाधन और संस्कृति को जबरन आत्मसात करने की राज्य -पोषित कार्पोरेटी ललक ; भेदभावपूर्ण रवैया और  राजकीय  दमन के विरुद्ध खड़ा हे श्रमजीवी मूल-निवासी !*

औपनिवेशिक-काल से आज तक संघर्षों का अनगिनत सिलसिला जारी है। ज़मीन और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण एवं उपयोग को लेकर आदिवासियों ओर राष्ट्रीय सरकारों के बीच टकराव हो रहे हैं। 18वीं शताब्दी के मध्य से भारत में केन्द्रित राज्य व्यवस्था के विरुद्ध आदिवासियों के सामाजिक रणहुंकार के कारण आदिवासी क्षेत्रों में स्वशासी व्यवस्था को कानूनी मान्यता का बीजारोपण हुआ। तब से लेकर 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् द्वारा संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार आयोग को दुनिया भर के आदिवसियों के ऊपर किये जा रहे अन्याय एवं पक्षपातपूर्ण समस्यायों का अध्ययन करने के लिए ज़िम्मेदारी देने तक का सफ़र पूरा हुआ है।

अमेरिकी महाद्वीप में मूल निवासियों के साथ अन्यायपूर्ण भेदभाव पर वर्ष 1977 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रायोजित जिनेवा सम्मेलन में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पूंजी-केन्द्रित दमनकारी राज्य व्यवस्था को चुनौती दी गई। इसके कारण 12 अक्टूबर को मनाए जाने वाला 'कोलंबस दिवस' खारिज हुआ और ‘मूल निवासी दिन‘ का प्रचलन शुरु हुआ, जिस पर 2021 में ही जाकर अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी मुहर लगाई है। इस बीच 1982 में स्पेन समेत कुछ यूरोपीय देशों तथा सभी अमेरिकी देशों द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में वर्ष 1992 में क्रिस्टोफर कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज के 500 वर्ष पूरे होने का जलसा मनाने के प्रस्ताव का ज़ोरदार विरोध अफ्रीकी देशों तथा विश्व के आदिवासी समुदायों द्वारा किया गया।

23 दिसम्बर 1994 को संयुक्त राष्ट्र संघ की आमसभा में प्रस्ताव क्रमांक 49/214 पारित किया गया, जिसके ज़रिये अन्तर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दशक (1995-2004) का पालन करने की घोषणा करते हुए हर साल 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। यह दिन इसलिए तय किया गया, क्योंकि इसी दिन 1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ का 'मानव अधिकारों का  उत्थान व सरंक्षण' विषय पर मूलनिवासियों के मानव अधिकारों पर चर्चा हेतु गठित उप-आयोग के वर्किंग ग्रुप की पहली मीटिंग हुई थी। 2005-14 को अंतर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दशक घोषित हुआ तथा 13 सितम्बर, 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मूल निवासियों के अधिकारों का महत्वपूर्ण घोषणा पत्र जारी हुआ, जिसके जरिये पहली बार मूलनिवासियों के सामुदायिक अधिकारों (राजनैतिक, कानूनी, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों) एवं स्वनियंत्रण को अंतर्राष्ट्रीय कानूनी भाषा-शास्त्र का हिस्सा बनाया गया।

कुल मिलाकर देखा जाएँ, तो संयुक्त राष्ट्र संघ का मूलनिवासी घोषणा पत्र स्वशासन एवं प्रत्यक्ष लोकतंत्र की प्राथमिकता को प्रतिपादित करता है। भारत के संदर्भ में देखें, तो भारत के संविधान का मूल भावना तथा नेहरूजी द्वारा “आदिवासियों के लिए पंचशील सिद्धांत“ से बहुत हद तक मेल खाता है। इस संबंध में संविधान की 6वीं अनुसूची, 7वीं पंचवर्षीय योजना में स्व -प्रवंध पर जोर, आदिवासियों के भूमि अधिकारों पर भारत सरकार द्वारा नियुक्त समिति की रिपोर्टें, भूरिया समिति रिपोर्ट तथा भूरिया आयोग रिपोर्ट, पेसा तथा वन अधिकार (मान्यता) कानून ; पंचायत राज मंत्रालय द्वारा पूरे देश में पंचायती कानून में सरंचनागत संशोधन हेतु प्रारूप 3 बिल (पूरे देश में प्रत्यक्ष लोकतंत्र का विस्तार), संघ-राज्य संबंधों पर आयोग की सिफारिशों में निहित धारणाएं तथा अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति आयोग की सिफारिशों का उल्लेख किया जा सकता है।

लेकिन यह भी सच है कि राष्ट्र हित (वास्तव में, सत्ता-दलालों के स्वार्थ हित) के नाम पर संसाधनों से धनी आदिवासी बाहुल्य इलाकों से विकास के नाम पर संसाधनों के दोहन के लिए कानूनी व प्रशासनिक प्रक्रियाओं की हेरफेर चलती रही है। 1990 से अपनाई गयी भू-मंडलीकरण-निजीकरण-उदारीकरण की नीति ने तथा 2014 से उस धारा के तीव्र एवं खूंखार ध्रुवीकरण (सांप्रदायिक तथा धन-पिपासु दरबारी कार्पोरेट पूंजी के गठजोड़) ने लोकतंत्र-स्वशासन की अवधारणा को संवैधानिक धरातल पर नेस्तनाबूद किया है और चुनावी-निरंकुशता पर पहुँचकर भारत को गैर-लोकतान्त्रिक आज्ञापालक समाज बनाने के अमृतकाल की ओर धकेल रहा है। विपक्ष द्वारा जनवादी विकल्प पेश करने में असफल होने के कारण किसानों, मजदूरों और जनवादी-सामाजिक घटकों के पक्ष में बनाये गए सारे प्रचलित कानूनों और संवैधानिक व्यवस्थाओं में बदलाव किये जा रहे हैं।

आदिवासी क्षेत्र के लिए स्वशासन कानून (पेसा) तथा वन अधिकार (मान्यता) कानून को अब तक कहीं भी, किसी भी सरकार ने सही रूप से लागू नहीं किया है। अब तो आलम है कि कानून में संशोधन की रास्ता न अपनाते हुए नियमों में ही संशोधन करते हुए कानून को ही निष्प्रभावी बनाने के हथकंडे अपनाये जा रहे है। ताज़ा उदहारण :

वन अधिकार मान्यता कानून को निष्प्रभावी बनाने के लिए तथा वन संसाधनों को निजी पूंजी के हाथ में देने के लिए वन (सरंक्षण) अधिनियम, 1980 की धारा (4) के विरुद्ध जा कर  28 जून, 2022 को नियमों में संशोधन किया गया है, जिसके तहत वन भूमि को डीरिज़र्व, डाइवर्ट तथा लीज देने के पूर्व ग्रामसभा की सहमति की अनिवार्यता की खात्मा किया गया है [नियम 9(6)(ख)] एवं वन अधिकार कानून के तहत दावेदारों को अधिकार देने के पहले एवं आदिवासी अत्याचार अधिनियम का धता बताते हुए  गैर-वनीय कार्य के लिए वन भूमि के डाइवर्सन हेतु ग्रामीण सामुदायिक ज़मीन तथा डी-ग्रेडेड वन क्षेत्र को चिन्हित कर क्षतिपूर्ति वनीकरण नाम से लैंड-बैंक (न्यूनतम आकार 25 हेक्टयर का निरंतर ब्लाक; आरक्षित क्षेत्र में कोई भी न्यूनतम आकार नहीं ; ट्री-प्लांटेशन वाली निजी जमीन भी ली जाएगी) बनाया जायेगा, ताकि वन भूमि डाइवेर्सन की प्रक्रिया में तेज़ी लाया जा सके [नियम 11(2)]। इस हेतु संघ सरकार प्रत्यायित प्रतिपूरक वनीकरण तंत्र तैयार करेगी, [नियम 11 (3) (क)]। वन अधिकार तथा वन्यजीव सरंक्षण अधिनयम का हनन करते हुए आरक्षित क्षेत्र (राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य आदि से विस्थापित ग्रामीणों की ज़मीन में वनीकरण करने की अधिकार एजेंसी को प्राप्त होगा, [ नियम 11(च)]। 1000 हेक्टयर से अधिक (वृहद् परियोजना) के लिए वन भूमि डाइवर्सन को सैधांतिक रूप से अनुमति प्रदान किया है। इस स्थिति में चरणवार अनुमोदन का प्रावधान होगा [ नियम 9 (6) (घ)]। भौतिक कब्जा रहित वन क्षेत्र में पेट्रोलियम अन्वेषण लाइसेंस या पेट्रोलियम खनन पट्टे के लिए सरकारी  अनुमोदन आसानी से दे दी जाएगी  [नियम 9(5)] तथा   राजस्व वन या नारंगी वन क्षेत्र के डाइवर्सन के संबंध में जिला कलेक्टर एवं वन अधिकारी के संयुक्त सत्यापन से प्रस्तावकर्ता भूमि की अनुसूची एवं नक्शा प्राप्त कर लेंगे, [नियम 9 (4) (च)]। वन अधिकार मान्यता कानून की धारा 5 तथा नियम 4 (1)(च) का स्पष्ट हनन करते हुए वन वर्किंग प्लान के लिए वन विभाग के आला अधिकारी जिम्मेदार बनाते हुए एक प्रक्रिया के तहत संघ सरकार से पूर्व अनुमोदन लिए जायेंगे, [ नियम 10 ]।

वन अधिकार मान्यता कानून लागु होने के बाद वर्ष 2008 से 2021 तक 3,08,609 हेक्टयर वन भूमि डाइवर्ट हो चुकी है, जिसमें ग्रामसभा की विधि सम्मत सहमति ली नहीं गयी है। अब इन नियमां के बाद न तो पेसा कानून का और  न ही वन अधिकार  मान्यता कानून का कोई औचित्य बच पायेगा।

*इको-सेंसिटिव जोन* : माननीय सर्वोच्च न्यायलय का 3 जून 2022 का आदेश वन अधिकार मान्यता कानून की धारा 3 (1)(झ) तथा धारा 5 में प्रदत्त ग्रामसभा के प्रबंधन के अधिकार को नज़रंदाज़ करता है और राज्य स्तर पर पीसीसीएफ एवं गृह सचिव के हाथ में सारी शक्तियों का केन्द्रीयकरण करता है। इको-सेंसिटिव जोन के रूप में पर्यावरण सरंक्षण अधिनियम, 1986 के तहत हर आरक्षित क्षेत्र (अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यान इत्यादि) के सीमा से 1 कि.मी अर्धव्यास की दूरी को अधिसूचित क्षेत्र जोन के रूप में घोषित किया जाता है। 9 फरवरी 2011 की गाइडलाइन्स)। लेकिन जोन बनाने का कोई प्रस्ताव है, तो इस क्षेत्र का दायरा 1 कि.मी अर्धव्यास से बढ़कर 10 कि.मी. अर्धव्यास क्षेत्र हो जायेगा। इस जोन में कोई स्थायी सरंचना बनाना प्रतिबंधित है। इस जोन क्षेत्र का दायरा बढ़ाने के लिए सर्वोच्च न्यायलय की अनुमति अनिवार्य होगी।

*जैव-विविधता (संशोधन) बिल, 2021* : जैव-विविधता का सरंक्षण, सतत उपयोग तथा जैव संसाधनों के उपयोग से प्राप्त धनराशि के निष्पक्ष व न्यायसंगत बंटवारा के आधार को ही बदलकर कारपोरेट व्यापार को सहूलियत देने के लिए जैव-विविधता अधिनियम, 2002 में संशोधन  किया जाना प्रस्तावित है। इससे जो पारंपरिक रूप से उपयोगी पदार्थों का ज्ञान रखते हैं, उन्हें उन पदार्थों का लाभ न दिलाते हुए, 
व्यापार कंपनियों को लाभ पहुंचाया जाएगा तथा इससे वन अधिकार मान्यता कानून की धारा 5 का हनन होगा . 

देश में लगभग 2,75,000 जैव विविधता प्रबंधन समितियां हैं, जो जन जैव-विविधता रजिस्टर (पीबीआर) बना चुके हैं और जिनको 2014 की गाइडलाइन्स के तहत एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग रेगुलेशन के तहत लाभ में हिस्सेदारी मिलने का कानूनी अधिकार है, [धारा 21 (2)]। साथ ही इस हिस्सेदारी के तहत जैव-संसाधनों के सतत संवर्धन एवं  उपयोग के लिए कंपनियों को इसकी लागत में खर्चा वहन करना सुनिश्चित किया गया है।भारत का आयुर्वेद उद्योग सालाना करीब 30,000 करोड़ रुपयों का व्यापार करता है।

संशोधित अधिनियम में “लाभ के दावेदारों“ की परिभाषा बदल कर ‘पारंपरिक ज्ञान-जानकारी  से संबंध रखनेवाला धारक   ‘(एसोसिएटेड होल्डर्स ऑफ़ ट्रेडिशनल नॉलेज') लाभ के दावेदार के रूप में परिभाषित किया गया है। यहाँ तक कि वे  भारतीय लिखित पारंपरिक ज्ञान से अलग होंगे अर्थात आयुर्वेद, यूनानी तथा सिध्दा उपचार पद्धति के उपयोग में आनेवाला पदार्थ, ज्ञान तथा उसकी उत्पादन में लगे लोगों (किसानों, आदिवासियों एवं अन्य परम्परागत वन-निवासियों तथा सारे जैव-विविधता प्रबंधन समितियों द्वारा तैयार की गयी लिखित जानकारी) को लाभ नहीं मिलेगा। इस संशोधन से सारे दवा उद्योग अपने मुनाफे को जैव सरंक्षण-संबर्धन में लगे लोगों-समुदायों को बाँटने से इंकार कर देंगे।

अब तक किसी विदेशी कम्पनी या विदेशी व्यक्ति या किसी भारतीय कम्पनी के किसी विदेशी शेयरहोल्डर को भारतीय जैव-विविधता के संबंध में कोई शोध या व्यापार करने के पहले राष्ट्रीय जैव–विविधता प्राधिकरण से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है, [धारा 3(2)(ग)]। इस प्रावधान को संशोधित करते हुए प्रस्ताव रखा गया है कि कोई भी विदेशी कंपनी या व्यक्ति भारतीय जैव संसाधन पर शोध एवं व्यापार कर सकता है।

*राज्य जैव-विविधता बोर्ड की नियामक शक्तियों का खात्मा*  : भारतीयों द्वारा कोई भी जैव-संसाधन पर सर्वे या उपयोग या व्यापारिक कार्य करने के पहले राज्य बोर्ड को पूर्व सूचना देना  आवश्यक था, जिस पर बोर्ड सहमति या असहमति दे सकती थी, (धारा 22)। यह प्रावधान स्थानीय लोगों – समुदायों, वैदों-हकीमों पर लागू नहीं होता था, (धारा 7)। अब इस प्रावधान को व्यापक कर दिया गया है, जिसके तहत कोई भी दवा कंपनी एवं वनस्पति की खेती करने वाले व्यक्ति को बोर्ड को न पूर्व सूचना देने की ज़रुरत होगी और न लाभांश का बंटवारा करेगी।

*दंड का प्रावधान में शिथिलता* : जैव-विविधता की विनाश के रोकथाम के लिए 2002 के कानून में संज्ञेय अपराध मान्य  करते हुए जुडिशल मजिस्ट्रेट कोर्ट के ज़रिये 3 से 5 साल का कारावास तथा क्षतिपूर्त राशि का प्रावधान था, (धारा 58)। प्रस्तावित संशोधन में मजिस्टेरियल कोर्ट को दायरे से हटाकर सरकारी अधिकारी द्वारा निपटारा, कारावास के प्रावधान को हटाना एवं केवल आर्थिक दंड के ज़रिये जैव विविधता की हानि की भरपाई करने के प्रावधान करके जैव संसाधनों के संपूर्ण कारपोरेटीकरण एवं पारंपरिक ज्ञान तथा जैव सम्पदा के विनाश का रोडमैप तैयार कर दिया गया है। यह  पेसा, वन अधिकार मान्यता कानून की धारा 5, अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता कन्वेंशन तथा नागोया प्रोटोकोल का घोर उलंघन है।

ऐसे ही भारतीय वन कानून,1927 एवं पर्यावरण (सरंक्षण ) कानून, 1986 में जो दंड प्रक्रिया पहले निहित थी, उसे सरलता तथा मौद्रिकता (monitize) में सीमित करते हुए संशोधन प्रस्तावित है, ताकि कार्पोरेट का हित साधन हो। लेकिन लोगों की वन एवं वन सम्पदा पर अधिकार को नज़रंदाज़ करते हुए औपनिवेशिक अपराधिक तंत्र को बरकार रखा जायेगा। यह नीति सिर्फ वनों पर नहीं, बल्कि मोदीजी के नेशनल मोनिटाइजेसन पाइपलाइन नीति के बाद अब पंचायत मंत्रालय “वाइब्रेंट ग्रामसभा" के नाम पर हर गाँव की परिसंपत्ति का कैसे मौद्रीकरण किया जायेगा, उसकी योजना बनाने की ज़िम्मेदारी ग्रामसभा को दी गई है।

 इसलिए हमारी मांग और संकल्प है कि :

* हर ग्राम में ग्राम सरकार [ स्वयं का विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका] (पेसा, 4 घ ) और 

हर जिले में जिला सरकार (पेसा, 4 ण) बनाने के लिए

* छत्तीसगढ़ में लागू सारे कानूनों में संशोधन करते हुए पेसा सम्मत बनाएंगे [पेसा (4) & (5)]

* पारंपरिक न्याय-नेतृत्व के ज़रिए ग्राम न्यायलय एवं जिला न्यायालय का गठन करते हुए सारे असंज्ञेय अपराधों को पारंपरिक न्यायलय के अधीनस्थ करेंगे (पेसा, 4 घ एवं 4 ण)

* ग्राम सभा की सहमति के बिना गांव के सामुदायिक संसाधनों का अधिग्रहण तथा हस्तांतरण वर्जित करेंगे। (पेसा 4 घ एवं वन अधिकार मान्यता कानून धारा 5)

* छत्तीसगढ़ के अनुसूचित क्षेत्र के प्रशासनिक व्यवस्था के लिए "छत्तीसगढ़ अनुसूचित क्षेत्र कानून संहिता" तथा "छत्तीसगढ़ अनुसूचित क्षेत्र  पब्लिक सर्विस कमीशन" का गठन करते हुए एक अलग प्रशासनिक कैडर तैयार करेंगे। (नेहरूजी के द्वारा घोषित पंचशील नीति,1952)

* छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता में संशोधन कर आंध्रप्रदेश अनुसूचित क्षेत्र भू-हस्तांतरण विनियम अधिनियम ( संशोधित 1970) के तर्ज पर कानून बनाएंगे।

 * वन प्रशासन को लोकतांत्रिक करने हेतु तथा आदिवासी और अन्य वन निवासियों के साथ हुए "ऐतिहासिक अन्याय" को सुधारने के लिए लाए गए वन अधिकार मान्यता कानून की रक्षा करते हुए वन सरंक्षण अधिनियम,1980 के संशोधित नियम,2022 ; भारतीय वन अधिनियम,1927 में प्रस्तावित संशोधन  ; पर्यावरण (प्रोटेक्शन) अधिनियम,1986 के  इको-सेंसिटिव जोन के संबंध में गाइडलाइन्स में प्रस्तावित संशोधन तथा वन्यजीव (सरंक्षण) अधिनियम,1972 की नियमों में किये जा रही संशोधनों को खारिज़ करते हुए इन्हें वन अधिकार मान्यता कानून के सम्मत बनाएंगे।

* अनुसूचित क्षेत्र एवं अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा सन 2004 में दी गयी सिफारिश के आधार पर छत्तीसगड़ के गैर-अनुसूचित क्षेत्र को अनुसूचित करेंगे (अर्थात 1951 की जनगणना के अनुसार जिस गांव में अनुसूचित जनजाति कुल जनसंख्या के 40% या अधिक हो, को आधार मान्य करो)

* अनुसूचित क्षेत्र में सर्व शिक्षा अभियान के तहत  शिक्षा प्रणाली को खारिज़ कर स्थानीय समुदायों की भाषा-संस्कृति आधारित परीक्षा प्रणाली के ज़रिए कॉमन स्कूल व्यवस्था को लागू किया जाये। (विद्यालय-पाठ्यक्रम-प्रशिक्षित शिक्षकों)

* अनुसूचित क्षेत्र में संविधान के अनुच्छेद 243 (य ग) का पालन करते हुए सारे गैर-कानूनी नगर पंचायतों /नगर पालिका को भंग करते हुए पेसा कानून के तहत पंचायती व्यवस्था लागू करो।

* संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा घोषित आदिवासी अधिकार घोषणा पत्र के अनुच्छेद 30 का अनुसरण करते हुए छत्तीसगढ़ के अनुसूचित क्षेत्र में सैन्यकरण बंद की जावें।

* लघु वनोपज, खनिज संपदा तथा जैव विविधता का सरंक्षण -संवर्धन-व्यापार में  ग्रामीण महिलाओं का सहभाग से ग्रामसभा के नेतृत्व में प्रबंधन हेतु प्रचलित कानून में संशोधन किया जावें।....


....बिजय भाई...

Friday, August 5, 2022

#ग्राम _सभा_सशक्तिकरण_हेतु

#एक_कदम.........
                      #गाँव_की_ओर........
#ग्राम _सभा_सशक्तिकरण_हेतु.....
           #प्रथम_चरण

आइए चलें अपने-अपने ग्राम सभा को सशक्त करने के लिए ताकि हम सब- "मावा नाटे मावा राज" - "अबुआ दिशुम अबुआ राज"  की सपना को साकार कर सकें।

एक कदम.... गाँव की ओर
एक कदम..... पुरखो के ज्ञान की ओर

एक कदम...... गाँव की ओर
एक कदम...... संस्कृति को समझने की ओर

एक कदम.... गाँव की ओर
एक कदम.... संविधान को समझने की ओर

एक कदम.... गाँव की ओर
एक कदम...... पेशा कानून को समझने की ओर

एक कदम...... गाँव की ओर
एक कदम...... रोफरा कानून को समझने की ओर

एक कदम .... गाँव की ओर
मेरे गांव में.. मेरी सरकार बनाने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
मेरे गांव में.... स्वशासन लाने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
जल-जंगल-जमीन को बचाने की ओर

एक कदम.... गाँव की ओर
जैवविविधता को संवर्धित करने की ओर

एक कदम...गाँव की ओर
खेलों में पदक विजेता बनने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
शिक्षा में  नई ऊचाई छुने की ओर

एक कदम ....गाँव की ओर
जल जगंल जमीन को अपना बनाने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
गावों को आत्मनिर्भर करने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
अपनी आजी काको की परम्पराओं को बचाने की ओर

एक कदम.. गाँव की ओर
अपने डीएनए में छुपे ज्ञान को पहचानने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
लैंगिक भेदभाव मिटाने की ओर

एक कदम...गाँव की ओर
अपनी गाँव में अपनी सरकार लाने की ओर

एक कदम.. गाँव की ओर
कर्जमुक्त रोजगार युक्त आत्मनिर्भर समुदाय बनाने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
गाँव की भाषाओं को.. आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की ओर
एक कदम.. गाँव की ओर
प्रकृति-पर्यावरण को बचाने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
गाँव के ज्ञान विज्ञान को सीखने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
RoFRA, PESA को जानने की ओर

एक कदम.. गाँव की ओर
लड़ाई झगड़े मिटाने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
गाँव से पलायन रोकने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
गाँव में प्रतिभाओं को तलाशने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
कोया पुनेम को समझने की ओर

एक कदम ...गाँव की ओर
हरियाली को बचाने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
अपने गाँव का अपना ब्रांड बनाने की ओर

एक कदम.. गाँव की ओर
अपना उत्पाद, अपना ब्रांड.. अपना निर्यात

एक कदम.. गाँव की ओर
रूढ़ि परम्परा.. बचाने की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
अपने गाँव में... अपने विधान की ओर

एक कदम... गाँव की ओर
हर गाँव में... ग्राम न्यायालय की ओर

एक कदम.... गाँव की ओर
गाँव स्वराज लाने की ओर

"🖋️KBKS  लिगल एड विंग "

*वन अधिकार मान्यता कानून को धरातल में क्रियान्वयन के लिए बैठक*

वन अधिकार मान्यता कानून को धरातल में क्रियान्वयन के लिए बैठक 

बस्तर संभाग के NGO और आदिवासी समुदाय के सामाजिक पदाधिकारीयों के साथ दिनांक 20.09.2021 दिन रविवार को चारामा ब्लाक के ग्राम चांवड़ी में सहभागिता समाज सेवी संस्था के भवन में वन अधिकार मान्यता कानून 2006 के क्रियान्वयन के संबधं बैठक आयोजित किया किया गया था जिसमे दिल्ली से आये बिराज पटनायक NFI, सहभागिता समाज सेवी संस्था, नवोदित समाज सेवी संस्था, परिवर्तन समाज सेवी संस्था, दिशा समाज सेवी संस्था, चौपाल, प्रदान, खोज संस्था के लोग उपस्थित रहे ।

 कांगे - कालेज के दौरान हमें एक तखती पकडाकर आन्दोलन में हिस्सा लेते थे उस तखती में यही लिखा हुआ करता था जल, जंगल, जमीन हमारा है, नारा भी यही लगते थे जब वापस घर में जाने के बाद पता चला कि जंगल वन विभाग का, जल सिंचाई विभाग का और गांव में बचा जमीन राजस्व विभाग के हाथों में है । मन में प्रश्न खड़ा होता था आखिर जल जंगल जमीन किसका है ? जब हम लोग इस प्रश्न का हल खोजन के लिए निकले तो पंचायती राज अधिनियम के अध्याय 14 के 129 ग में एक शब्द लिखा है गांव के सीमा के भीतर प्राक्रतिक स्रोतों को जिनके अंतर्गत भूमि, जल तथा वन आते हैं उसकी परम्परा के अनुसार प्रबंधन करने का अधिकार ग्राम सभा को दिया गया है। लेकिन इस कानून में गाँव के सीमा को परिभाषित नहीं किया गया है। 2006 में वन अधिकार कानून आया हम लोग इस दोनों पेसा कानून और वन अधिकार कानून को जोड़ कर काम कर रहें हैं, वन अधिकार का ग्राम सभा पेसा से उठाया गया है और पेसा का ग्राम सभा को पंचायती राज अधिनियम को तोड़ता कर बनाया गया है मतलब सरपंच और सचिव का नहीं चल सकता, पंचायती राज अधिनियम 1993 का ग्राम सभा 85 ब्लाकों में नहीं चल सकता इस बात को कलेक्टर और डीफओ को समझ आना चाहिए जिसके कारण रोना रो रहे हैं ग्राम सभा में फोरम नहीं होता लेकिन हमने करके देखे हैं फोरम पूरा हुआ है समुदाय शामिल हुआ ।  वन अधिकार कानून 2012 में संसोधन किया गया जिसमे गांव के पारम्परिक सीमा को निर्धारित किया गया, हमने 2013-14 में ही खैरखेडा से सामुदायिक अधिकार व सामुदायिक वन संसाधन अधिकार के लिए काम करना शुरू किया इस दरमियान भी बहुत सारी समस्या हुआ प्रशासन को इस कानून की कुछ भी समझ नहीं था जिसके कारण बहुत बहस हुआ, 2014-2015 में समाज के साथ जगदलपुर में एक बैठक हुआ समाज के पास भी हमने प्रस्ताव रखा लेकिन समाज के लोगों के पास भी समझ नहीं था इस कानून का कि कैसे जंगल को गांव वालों दे सकते हैं । इस दरमियानी कांकेर जिले में बहुत सारे गांव में दावा किया गया । लेकिन शासन प्रशासन में समझ नहीं होने के कारण अधिकार पत्र प्राप्त नहीं हुआ । उसके बाद हमने अपनी रणनीति पर बदलाव करते हुए प्रशासन के साथ बैठना शुरू किए टेबल टाक बैठक हुआ । समाज का बहुत आंदोलन शुरू हुआ,  2018 के विधानसभा चुनाव  में समाज के दबाव के कारण कांग्रेस अपने चुनावी घोषणापत्र में पालन करने की बात कही । और सत्ता में चुनकर आई । इस दरमियान सरकार और प्रशासन के साथ कई दौर का बैठक हुआ । सामुदायिक वन संसाधन दिलाने के लिए नगरी ब्लाक के कुछ गांव को चयनित किया गया वो इसलिए क्योंकि राजीव गांधी का जंयती मनाने के लिए दुगली में आने वाले थे और हमें इसी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के हाथों से अधिकार पत्र दिलवाना था, सरकार की इच्छा शक्ति थी कि छत्तीसगढ़ में जबर्रा का पहले सामुदायिक वन संसाधन का अधिकार पत्र मुख्यमंत्री के हाथों से प्राप्त हुआ । जबर्रा के बाद वन अधिकार का मार्गदर्शिका तैयार किया गया । जबर्रा का दावा फार्म मात्र 21 दिन में तैयार किया गया और समुदाय शामिल हुआ फोरम भी पूरा हुआ जबर्रा से पहले हम ने कांकेर जिले में  20 गांव का दावा फार्म तैयार कर लिए थे, मुख्यमंत्री का कांकेर का दौरा हुआ वंहा पर 20 गांव का मुख्यमंत्री के हाथों से दिया गया, तब थोड़ा बहुत अधिकारियों में कानून का समझ बनी सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन बाद में राजनिति हावी होने के कारण जल्द बाजी में व्यवधान उत्पन्न हुआ और गलत अधिकार पत्र जारी होने लगा, जिसे आज सुधारने की जरुरत है । हमने एक तिथि निर्धारित किये हैं 11 हजार ग्राम सभाओं में दावा कम्प्लीट करने के लिए ।      

             


Monday, July 18, 2022

एक कदम.... गाँव की ओर.... #ग्रामसभा #सशक्तिकरण

#KBKS
एक कदम......
                    गाँव की ओर...
ग्राम सभा सशक्तिकरण अभियान

#गाँव गणराज्य भारत का पुरातन परंपरा रही है. इसके लिए आदिवासी इलाकों में बहुत लम्बे समय से #बिरसा मुंडा , गूंडाधुर,तिलका माझी,सिद्धू-कान्नू इत्यादि अनगिनत शहीदों ने अंग्रेजी राज़ स्थापित होने के बाद भी संघर्ष लगातार चलाते  रहे।गांधीजी की सात लाख गाँव गणराज्यों के महासंघ  के रूप में आज़ाद भारत की कल्पना और उसके निर्माण के लिए संकल्प देश के आम जनता  के मन में सच्चे #लोकतंत्र के प्रति गहरी आस्था  को जगाया था। उसी भावना को मूर्तरूप देने हेतु #संविधान में  गाँव के स्तर पर पंचायतों की स्थापना के लिए #अनुच्छेद 40 का प्रावधान किया गया। हमारे संविधान के अनन्य महान शिल्पकार #डॉ भीमराव आंबेडकर ने उस  प्राचीन व्यवस्था को अंगीकार करते हुए बौध भिक्षु संघों में और उसके भी पहले  भारत के  अनेक गणराज्यों की #लोकतान्त्रिक परंपरा के साथ-साथ आज की विसंगितियों की ओर ध्यान आकर्षित किया था . संविधान में केंद्रीकृत व्यवस्था और गाँव गणराज्य की  विकेन्द्रिकृत व्यवस्था की  मान्यताओं के बीच के विरोधाभास को  #संविधान सभा के सभापति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने खुले तौर पर स्वीकार किया था. यही नहीं आदिवासी इलाकों के लिए जवाहरलाल नेहरु के #पंचशील नीति का आधार तत्व उस दिशा में एक पहल कदमी थी. सार तत्व यही था की राज्य व्यवस्था #संप्रभु (Sovereign) होते हुए भी सहभागी संप्रभुता (Shared Sovereignty) सिद्धांत को मान्य कर कार्य करेगा .
 
लेकिन यह खेदजनक ऐतिहासिक  सच्चाई है कि गाँव गणराज्य की मूल चेतना अंधाधुंध   विकास की यात्रा में अनदेखी रह गयी। खास तौर पर आदिवासी इलाकों में स्थानीय परंपरागत se- सामाजिक व्यवस्था और राज्य औपचारिक तंत्र के बीच की विसंगति  गहराती गयी। वहां टकराव जैसी स्थिति बनती गयी। इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के समाधान के लिए 1976  में श्रीमती इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में आदिवासी इलाकों के लोकतान्त्रिक विकास के लिए एक व्यापक योजना तैयार की गयी थी। उसमें परंपरागत व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए #5वी  अनुसूची के प्रावधानों को प्राथमिकता के आधार पर कार्यरूप देने का फैसला किया गया था .उसके अनुसार देश के सभी आदिवासी बहुल क्षेत्रों को अनुसूचित कर उन इलाकों में शोषण की समाप्ति ,समाज के #सशक्तिकरण और आर्थिक विकास की त्रि – सूत्री कार्यक्रम को उसी प्राथमिकता के अनुसार कारगर रूप से लागु किया जाना था। यह योजना भी फिर से विकास की दौड़ के आप धापी और पीछे रह गयी। अस्सी के दशक में देश की बिगड़ती हालत की समीक्षा में पंचायतों की उपेक्षा उस बदहाली के लिए एक प्रमुख कारण के रूप में सामने आई, तो पंचायत राज को संविधान में स्थापित करने का संकल्प लिया गया। इस  सिलसिले में आदिवासी परंपरा और राज्य की व्यवस्था के बीच गहराती विसंगति और बढ़ते टकराव की बात भी सामने आई, जिसका मुख्य कारण था, आदिवासी इलाकों में #पाँचवीअनुसूची के प्रावधानों  का ईमानदारी से अमल ना होना ।
 
इस चुनौती से मुकाबला करने के लिए आदिवासी परंपरा से संगत व्यवस्था स्थापित करने के लिए पुराना संकल्प दोहराया गया और 73वा संविधान संशोधन में अनुसूचित क्षेत्रों को सामान्य पंचायत व्यवस्था से बाहर रखने के लिए फैसला किया गया। पंचायतों के लिए संविधानिक प्रावधानों को ज़रूरी अपवादों और संशोधनों के साथ अनुसूचित क्षेत्रों में लागु करने की तारतम्य में संसद ने पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार)अधिनियम बनाया, जो देश के सारे अनुसूचित क्षेत्रों पर 24 दिसम्बर 1996 में लागू हो गया।
 
इस कानून में ग्रामसभा को स्वयम्भू गाँव समाज के औपचारिक रूप में स्थापित किया गया। इसमें ग्रामसभा को अधिकार देने की बात जो असली लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है नहीं की गयी, उसकी बजाए गाँव के स्तर पर ग्रामसभा सभी तरह के कामकाज को अपनी परंपरा के अनुसार करने के लिए सक्षम है इस सहज परन्तु बुनियादी बात को नयी कानूनी व्यवस्था में औपचारिक रूप से मान्य करते हुए शामिल किया गया। #पेसा अधिनियम में सुधार की गुंजाइश होते हुए भी, आदिवासी शहीदों के अरमानों और गांधीजी के सपनों का गाँव गणराज्य की स्थापना की दिशा में पहला निर्णायक कदम है।
 
आदिवासी मामलों में छत्तीसगढ़ का हमारे देश में विशिष्ट स्थान है . पूरे छत्तीसगढ़ के  भू –भाग का करीब 60 प्रतिशत पर फैला अनुसूचित क्षेत्र है . राज्य की व्यवस्था का व्यावहारिक रूप तो लोगों के सामने प्रशासनतंत्र  की  विभिन्न संस्थाएं ,उनमे काम करने वाले नौकरशाहों के व्यवहार और उनको संचालित करने  वाले नियम कानून के रूप में आता है। अपनी परंपरा के अनुसार काम करने की व्यवस्था में इस केंद्रीकृत व्यवस्था का  पूरा नक्शा उलट जाना स्वाभाविक है। पेसा नियम में प्रावधानित नयी व्यवस्था में यह साफ है कि सभी संस्थाएं और उनके कर्मचारी ग्रामसभा के प्रति ज़िम्मेदार होंगे , केंद्र और राज्य में बने नियम कानून ग्रामसभा के लिए , सहभागी लोकतंत्र की बुनियादी इकाई की गरिमा के अनुरूप  बाध्यकारी न हो कर मार्गदर्शक ही हो सकते है।
 
परन्तु इसमें सबसे बड़ी चुनौती यही है कि राज्य सत्ता से जुड़े नेतृत्व, विभागीय  अधिकारी एवं कर्मचारीगण, पंचायत सदस्यों  को इस कानून- नियम को आत्मसात करने के लिए बड़ा कदम उठाना होगा तथा गाँव के लोग इस परिवर्तनकारी वदलाव को समझे ।#ग्रामसभा की गरिमामयी भूमिका का एहसास करें और यह बात उनके पास ऐसे लिखित रूप में पहुंचे जिसे वे पढ़कर या सुनकर आत्मविश्वास के साथ अपनी #स्वशासन व्यवस्था का संचालन  अपने हाथ में ले सकें। लेकिन ऐसा हुआ नही। और केंद्रीकृत शासन व्यवस्था और गाँव गणराज्य की  विकेन्द्रिकृत व्यवस्था की  मान्यताओं के बीच के विरोधाभास में राज्य कुछ अधिकार को जो गॉव समाज के हैं, विकेंद्रीकरण करना नही चाहते। पर इस मंशा को एक वर्ष के भीतर सभी नियमि, कानून, आदेश, निर्देश, परिपत्र, विनियम आदि में बदलाव/परिवर्तन जो पेसा संगत नही है, उसे पेसा संगत बनाना। ये बड़ी चुनौती है। इसे सबको स्वीकार करना चाहिए, और इस काम को करने सभी को सभी स्तर पर जुट जाना चाहिए।

एक कदम....
                   गाँव की ओर....

#ग्रामसभा #सशक्तिकरण


अश्वनी कांगे 

7000705692

सामाजिक चिंतक कांकेर, छत्तीसगढ़ ,

संस्थापक सदस्य-

KBKS, NSSS, SANKALAP, KOYTORA,

पूर्व जिला अध्यक्ष-अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद कांकेर।

पूर्व ब्लॉक अध्यक्ष - गोण्डवना युवा प्रभाग ब्लॉक चारामा, जिला कांकेर।

पूर्व प्रांतीय उपाध्यक्ष, सर्व आदिवासी समाज छत्तीसगढ़, युवा प्रभाग।

कोर ग्रुप सदस्य, गोंडवाना समाज समन्वय समिति बस्तर संभाग।

वर्किंग ग्रुप सदस्य, सब ग्रुप, छत्तीसगढ़ योजना आयोग 

Organizer- All India Adivasi Employees Federation,(AIAEF) Chhattisgarh

ashwani.kange@gmail.com 

Friday, December 31, 2021

"Amrit Mahotsav" of Independence Vs "Silver Jubilee" of PESA

 "Amrit Mahotsav" of Independence Vs "Silver Jubilee" of PESA

A contrast for tribals of fifth schedule areas 

This year and the year after the central government is celebrating Amrit Mahotsav of Independence. It would be 75 years of India’s independence on 15th August 2022. People residing in Fifth Schedule Areas of the country are also celebrating this Amrit Mahotsav by participating in various programs being organized. However, there is another reason for them to celebrate apart from this. The Provisions of the Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act, 1996 (fondly known as PESA Act), turns 25 on December 24, 2021. Therefore the Adivasis have dual occasion to celebrate: Amrit Mahotsav along with the Silver Jubilee of PESA Act.

Every festival is an occasion for happiness. But there is apprehension and fear in the minds of people of fifth schedule areas regarding this Amrit Mahotsav and Silver Jubilee. A recurring question for them is, "should we celebrate or not?" Have these two festivals really brought prosperity or are they occasions to ridicule them after gradually handing over their water-forest-land resources in private hands?

If we look at 75 years of independence, till date none of the innocent people living in the forests have been able to understand any of the provisions and laws written throughout the history of these democratic years. Why so? Because the tribal community does not have any system of written constitution and law. They follow unwritten constitution and laws through their oral traditions. However when they look through hundreds of written laws passed by successive governments in the last 75 years which touches upon the unwritten laws of water, forest, land, culture and livelihood of the tribal, the only name that comes to their mind is PESA.

PESA, which came into force on December 24, 1996, on its silver jubilee today is providing everyone with an opportunity to ponder whether the freedom that everyone got 75 years ago also got fully extended to the tribal and the residents of the Fifth Schedule areas. Or rather it is an opportunity to ponder about the ways and means through which the freedom enjoyed in the past has also been slowly being snatched away from them through successive skullduggery of every government that ruled this country.

In the last 25 years of enactment of PESA out of 10 states of central India, where it is applicable, its rules have not framed for Chhattisgarh, Madhya Pradesh, Odisha and Jharkhand. It is a matter of wonder how the law, whose rules have not been made, would have been implemented in these states in last 25 years. For rest of the states too, the rules have been framed only in the last decade. The central government and the state governments should answer on what they have done for last 25 years in absence of rules.

It is therefore imperative for us to raise at least 25 questions from our side for these last 25 years. Both the central and state government will have to answer these. Perhaps while answering them, they would be able to reflect on what steps they have taken so far to make Panchayati Raj system an autonomous institute of self governance as written in Article 40 of the Constitution. If the governments are not able to answer then we are bound to doubt their intentions. 

For last 25 years, the tribal society and every society living in the Fifth Schedule areas has been fooled by governments who have toyed around with the idea of PESA. These societies now need to fight their own battle on the road, in the panchayats, in the state assemblies and in the Parliament along with a parallel fight in the courts to realize their constitutional rights enshrined in PESA.  Else for the next 25 years again they will again be toyed around with in the process and there wouldn’t be any Fifth Schedule Areas left in next 25 years which this humane law intends to protect. 


Ashwani Kange

Social Thinker 

Kanker, Chhattisgarh Mo.7000705692

 

Tuesday, December 28, 2021

आजादी का “अमृत महोत्सव” बनाम पेसा की “रजत जयंती

 आलेख


*आजादी का “अमृत महोत्सव” बनाम पेसा की “रजत जयंती”*


इस साल और अगले साल केंद्र सरकार आजादी का अमृत महोत्सव मना रही है. 15 अगस्त 2022 को भारत की आजादी के 75 साल हो रहे हैं. इस अमृत महोत्सव में छत्तीसगढ़ के पांचवी अनुसूची क्षेत्रों के आमजन भी अलग अलग अवसरों में सहभागी बनते आ रहे हैं. अमृत महोत्सव के साथ उनके लिए उत्सव का एक और कारण है. जल-जंगल-जमीन का अधिकार देने वाला पेसा  कानून 24 दिसंबर 2021 को 25 साल का हो रहा है. इसलिए आदिवासियों के पास अमृत महोत्सव और रजत जयंती मनाये जाने का विषय एक साथ है. 


हर उत्सव खुशी का होता है, पर इस अमृत महोत्सव और रजत जयंती को ले कर पांचवी अनुसूची क्षेत्रो के लोगो के मन में आशंका है. थोडा डर भी है. सवाल है कि, “हम उत्सव मनाये की नहीं?” क्या यह दोनों उत्सव आम जनता की के लिए सच में खुशहाली लाये है या फिर उनके जल-जंगल-जमीन को धीरे-धीरे निजी हाथों में दिए जाने की ख़ुशी में पांचवी अनुसूची क्षेत्र के लोगो का उपहास उड़ा रहे है?


आजादी के 75 साल को देखे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिस प्रकार हर प्रावधान और कानून लिखित में होता है वो आज तक जंगल में रहने वाले भोले-भाले लोगो को समझ नहीं आ पाया है. ऐसा क्यों? क्योंकि आदिवासी समुदाय का लिखित संविधान और कानून नहीं होता है. वह तो अलिखित संविधान से चलते है. लेकिन जब हम खोजते है कि पिछले 75 साल में सरकारों के सैकड़ो लिखित कानूनों में ऐसा कौन सा कानून है जो आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और जीवन यापन के अलिखित कानूनों को समेटे हुए है तो एक ही नाम सामने आता है “पेसा कानून.”  और दूसरा RoFRA ये दोनों कानून एक दूसरे के पूरक है इसको दोनो को एक साथ ही देखना चाहिए। 


सन 1996 की 24 दिसंबर से लागू यह पेसा कानून हमारे लिए आज यह चिंतन करने का अवसर दे रहा है कि क्या आजादी के 75 साल बाद भी जो स्वतंत्रता और आजादी सभी को मिली थी क्या वह आदिवासियों और पांचवी अनुसूची क्षेत्र के निवासियों को भी पूर्ण रूप से मिली है या पूर्व की आजादी भी उनसे धीरे-धीरे छिनती जा रही है.क्या इस क़ानून के जरिये उपलब्ध संसाधनों को पूंजीवाद की व्यवस्था में लेकर जा रहे हैं। ऐसे कई सवाल हमारे सामने है।


पेसा कानून के लिए 25 साल में अब तक मध्य भारत के 10 राज्यों में जहाँ यह कानून लागू होता है उसमे से छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा और झारखण्ड में नियम ही नहीं बने हैं. जिस कानून के नियम ही नहीं बने हो वह कानून 25 सालों में कैसे चला होगा यह सोचने का विषय है. केंद्र सरकार और राज्य सरकार इस पर जवाब दे कि 25 सालों तक उन्होंने क्या किया है. 


इन 25 सालों के लिए हमारी ओर से 25 सवाल तो खड़े करना तो लाजमी है. इन सभी के जवाब तो केंद्र और राज्य सरकार दोनों को ही देने होंगे. शायद इनका जवाब देते हुए वह इस बात पर चिंतन कर पाए कि संविधान के अनुच्छेद 40 में लिखित पंचायती राज व्यवस्थाओं को स्वायत्त इकाई बनाने के लिए सरकार ने अब तक क्या कदम उठाये हैं. क्या उन्होंने ग्राम सभा और पंचायतो को स्वशासन की इकाई बनने के लिए कुछ पहल की है या उनके पूर्व में चले आ रहे स्वशासन को छीनने का काम किया है?


अगर सरकार इस बात का जवाब नहीं दे पाती है तो हमें उनके नियत पर शक करना लाजमी है. 25 साल तक पेसा के झुनझुना से आदिवासी समाज और पांचवी अनुसूची क्षेत्र में रहने वाला हर समाज खेलता रहा है. अब समाज को कानून के साथ साथ व्यस्क हो कर अपने अधिकार पाने के लिए सड़क से संसद तक और साथ साथ कोर्ट में अपनी लड़ाई लड़नी होगी, नहीं तो अगले 25 साल के लिए फिर पेसा के नाम का झुनझुना के साथ लालीपॉप पकड़ा दिया जायेगा.

वर्तमान में छत्तीसगढ़ केबिनेट और TAC ने छत्तीसगढ़ के पेसा नियम 2022 को पास किया हैं  और 8 अगस्त 22 को अधिसूचित हो गया है अभी देखना होगा कि यह नियम किस तरह से गांव में स्वशासन दिला पायेगा?? और गाँव समाज गांव सरकार की परिकल्पना को कैसे साकार कर पायेगा? 


*पेसा की चुनौतियों और जोखिम*  पर अगला लेख क्रमशः....


अश्वनी कांगे 

7000705692

सामाजिक चिंतक कांकेर, छत्तीसगढ़ ,

संस्थापक सदस्य-

KBKS, NSSS, SANKALAP, KOYTORA,

पूर्व जिला अध्यक्ष-अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद कांकेर।

पूर्व ब्लॉक अध्यक्ष - गोण्डवना युवा प्रभाग ब्लॉक चारामा, जिला कांकेर।

पूर्व प्रांतीय उपाध्यक्ष, सर्व आदिवासी समाज छत्तीसगढ़, युवा प्रभाग।

कोर ग्रुप सदस्य, गोंडवाना समाज समन्वय समिति बस्तर संभाग।

वर्किंग ग्रुप सदस्य, सब ग्रुप, छत्तीसगढ़ योजना आयोग 

Organizer- All India Adivasi Employees Federation,(AIAEF) Chhattisgarh

ashwani.kange@gmail.com